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विद्यालय का परिचय


स्थापना एवं उद्देश्य ::

4 मार्च 1902 में स्वर्गीय ( महात्मा मुंशीराम ) स्वामी श्रद्धानन्द जी ने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के संचालन में हरिद्वार से पांच मील दूर गंगा के पूर्वीय तट पर बिजनौर निवासी चौ0 अमन सिंह जी द्वारा प्रदत्त कांगड़ी ग्राम में गुरुकुल की स्थापना की। सन्‌ 1924 ई0 की भयंकर बाढ़ से गुरुकुल भवन प्राय: नष्ट हो गए जिसके परिणाम स्वरूप अब यह संस्था हरिद्वार से तीन मील दूर दक्षिण दिशा में गंगनहर के किनारे ;कनखल-ज्वालापुर, दिल्ली बाई पास रोड़ परद्ध एक विस्तृत भूभाग पर स्थित है।

इस संस्था का उद्देश्य पवित्र तथा शान्त वातावरण में प्राचीन वैदिक संस्कृत और विभिन्न आधुनिक विज्ञान की उच्च शिक्षा देना है, जिससे विद्यार्थी विद्वान्‌, चरित्रवान, बलवान, देशभक्त और आत्म निर्भर नागरिक बन सकें।

मौलिक विशेषताएँ ::
1- अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बालकों को छोटी आयु (6 से 12 वर्ष) में प्रविष्ट किया जाता है और सदाचारी गुरुजनों की देख-रेख में रखा जाता है।

2- सुकुमार मति बालकों को शहरों के दूषित वातावरण से दूर ऐसे वातावरण में रखने का प्रयास किया जाता है जिससे उनकी शारीरिक मानसिक तथा आध्यात्मिक उन्नति निर्बाध रूप से हो सके।

3- सामान्यतया बालकों को घर नहीं भेजा जाता। बालकों के संरक्षक दो माह में एक बार उन्हें यहाँ आकर मिल सकते हैं। विशेष स्थिति में बालकों को घर जाने की आज्ञा भी दे दी जाती है।

4- छात्रों के खान-पान, रहन-सहन आदि की सम्पूर्ण व्यवस्था गुरुकुल की ओर से की जाती है। सात्विक एवं निरमिष भोजन दिया जाता है। एक शिक्षा, एक भोजन, एक आसन तथा समान व्यवहार है।

5- केन्द्रीय शिक्षणालयों में पढ़ाये जाने वाले अंग्रेजी, इतिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान, हिन्दी, संस्कृत, धर्मशिक्षा, जीव विज्ञान, कम्प्यूटर, वाणिज्य आदि सभी विषयों की शिक्षा दी जाती है तथा योग विज्ञान विषय भी अनिवार्यत: मुख्य रूप में है।

6- इन विविध विषयों के अध्यापन के अतिरिक्त स्वास्थ्य तथा चरित्र निर्माण, जीवन को मर्यादित, संयमित अनुशासित तथा संस्कारयुक्त बनाने पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।

7- यह सब होते हुए भी शिक्षा-शुल्क सर्वथा नहीं लिया जाता। छात्रों से केवल भोजन एवं आवास का वास्तविक व्यय ही लिया जाता है।

8- गुरुकुल विद्यालय को किसी भी प्रकार की राजकीय अनुदान या सहायता नहीं मिलती है।

9- इस प्रकार यह गुरुकुल भारतीय रहन-सहन व वातावरण में परिपोषित एक अनिवार्य आश्रम पद्धति पर संचालित है। विद्यालयों में भारत के अधिकतम प्रान्तों के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

10- विद्यार्थियों के रहने हेतु आधुनिक सुविधाओं से युक्त दो मंजिला विशाल ब्रह्मचर्याश्रम, पढने तथा भोजन आदि के लिए सुन्दर, स्वच्छ भव्य भवन हैं एवं खेलने हेतु खुला मैदान है। प्रत्येक कक्षा का एक अधिष्ठाता है, जिसके निरीक्षण में विद्यार्थी नित्यकर्मों का पालन करते हैं। ब्रह्मचर्याश्रम आश्रमाध्यक्ष की देखरेख में व्यवस्थित रहता है।

11- समय् पर विद्यार्थियों को गुरुजनों के साथ सरस्वती यात्रा पर भी ले जाया जाता है।

12- संस्कृत एवं अंग्रेजी संभाषण की व्यवस्था है।

 
 

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