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प्रधानाचार्य का संदेश

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुरुकुल-शिक्षा ही बालक के निर्माण की कार्यशाला है

जो देश उन्नति करने लगता है वह योजनाओं का तांता सा बांध देता है, कोई पंचवर्षीय योजनायें कोई दस वर्षीय योजनायें। हर कार्य मशीनों द्वारा होने लगता है कम्प्यूटर, मोबाईल आदि नये-नये आविष्कारों की विव में क्रान्ति सी आ गयी है। घर-घर कम्प्यूटर, मोबाईल, कार आदि हो जायें, चप्पे-चप्पे पर रेल बिछ जाये , सड़कें चौड़ी सुन्दर बन जाये, भवन ऊंचे-ऊंचे बन जायें, असीम आविष्कार एवं उत्पादन बढ़ जाये तो हम समझने लगते हैं कि हमारा विकास हो गया, अब दूसरी कोई समस्या नहीं रही, किन्तु वह मानव जिसके लिए हम सब कुछ करते हैं, वह आज कहाँ जा रहा है? उसके लिए हमने कौन-सी योजना बनाई है? इन सबका उपभोग करने वाला मानव अगर सच्चा न हो, ईमानदार न हो, सुसंस्कारित न हो, दूसरे के दुख से दुखी, सुख से सुखी होने वाला न हो । दुराचारी हो, भ्रष्टाचारी हो दुर्व्यसनी हो, दुर्गुणी हो, तो ये सब आविष्कार, उत्पादन, विकास किस काम आयेंगें?

वास्तव में गुरुकुल शिक्षा की सबसे महत्वपूर्ण विषेशता यह है कि विद्यार्थियों के चरित्र का निर्माण करने के लिए उनकी दिनचर्या पर विषेा ध्यान दिया जाता है। विद्यार्थियों का प्रत्येक क्षण सूचीबद्ध तरीके से निर्मित होता है, जिनका पालन करना उनके अधिष्ठाताओं तथा गुरुओं का कर्तव्य होता है। प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में जागने से लेकर रात्रि सोने तक विद्यार्थी श्रृंखलाबद्ध तरीके से विद्याध्ययन करने, भोजन करने तथा खेल-कूद आदि समस्त क्रियाकलापों में व्यस्त रहता है। इस प्रकार की दिनचर्या का लाभ यह होता है कि बचपन से ही अनुशासन में रहकर बालक की शिक्षा इतनी मजबूत हो जाती है कि वह चरित्रवान होकर अपना समस्त जीवन बिना किसी कठिनाई के व्यतीत करने में तत्पर रहता है। गुरुकुल-शिक्षाा का उद्देय यह है कि छात्र गुरु के सानिध्य में रहकर शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का विकास करें। शरीर से वें स्वस्थ, बलवान, तेजस्वी, और दीर्घायु बनें तथा मन, बुद्धि और आत्मा से दृढ-संकल्प, मेधावी, ज्ञानवान, यास्वी एवं ब्रह्मवर्चस्वी बनें।

माता-पिता बालकों को गुरुओं के समीप लाकर कहते हैं - हे गुरुजनों! आप इस कुमार को अपने गर्भ में धारण कीजिए, जिससे यह सच्चा मानव बन जाये। एक सच्चा पुरुष, सच्चा मनुष्य, सच्चा नागरिक बनाना भी गुरुकुल शिक्षा का उद्देय है। इस प्रकार गुरुकुल-शिक्षा एक ऐसी प्रणाली है, जिससे विद्यार्थियों के बौद्धिक स्तर के साथ-साथ उनका नैतिक स्तर भी उज्ज्वल रहता है, जिसके परिणामस्वरूप गुरुकुल के स्नातक अच्छे समाज का निर्माण करने तथा राष्ट्र निर्माण में अग्रसर रहते हैं।

इस प्रकार उद्घोषपूर्वक कहा जा सकता है कि गुरुकुल-शिक्षा ही आज भटकती हुई मानवता को कल्याण-पथ की ओर अग्रसर कर सकती है। आपके बालकों का भविष्य आप सभी माता-पिता के हाथों में सुरक्षित है, निर्णय आप के हाथों में है।

(डा0 विजेन्द्र शास्त्री)
मुख्याध्यापक

 
 

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